दीपक वर्मा जशपुर छत्तीसगढ़
जशपुर/कुनकुरी - हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी महिलाओं ने निर्जला व्रत रखकर तीज के पर्व अशोक चौधरी के घर डुगडुगिया में धूमधाम से मनाया ।
महिलाओं की टोली सुबह से ही तीज त्यौहार को लेकर पूजा सामग्री जुटाने में व्यस्त थीं, वहीं उनकी चेहरों में खुशियों की रौनक झलक रही थीं, क्योंकि पिछले दो साल से कोरोना की वजह से महिलाओं ने घर पर ही उपवास कर तीज का पर्व मनाया था। इस कठिन पतिव्रता व्रत की पूजा सभी महिलाओं ने अपने अपने मोहल्लों में एक जुट होकर हरतालिका व्रत कथा पूजन किया।
हरतालिका पर्व को तीज या फिर तीजा भी कहा जाता है। यह व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जा रहा है इस दिन कुंवारी कन्यााएं और सुहागिन महिलाएं भगवान शंकर और माता पार्वती की सच्चे मन से पूजा करती हैं। यह व्रत प्रमुख तौर पर उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और बिहार में मनाया जाने वाला करवाचौथ से भी कठिन पूजा माना जाता है क्योंकि जहां करवाचौथ में चांद देखने के बाद व्रत तोड़ दिया जाता है वहीं इस व्रत में पूरे दिन निर्जला व्रत किया जाता है और अगले दिन पूजन के पश्चात ही व्रत तोड़ा जाता है।
हरतालिका तीज का महत्व
मान्यता है, सौभाग्यवती महिलाएं अपने सुहाग को अखंड बनाए रखने और अविवाहित युवतियां अपने इच्छित वर पति को पाने के लिए यह व्रत करती हैं। ऐसा माना जाता है, सबसे पहले यह व्रत माता पार्वती ने सबसे भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए रखा था। उन्हीं का अनुसरण करते हुए महिलाएं माता पार्वती और शिवजी जैसा दांपत्य जीवन पाने के लिए यह व्रत करती हैं।
ऐसे रखा जाता है हरतालिका तीज का व्रत
इस दिन व्रत करने वाली सुहागन स्त्रियां सूर्योदय से पूर्व ही उठ जाती हैं और स्नान - ध्यान करके पूरा श्रृंगार करती हैं। पूजन के लिए केले के पत्तों से मंडप बनाकर गौरी - शंकर की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके साथ पार्वती जी को सुहाग का सारा सामान चढ़ाया जाता है। रात में भजन, कीर्तन करते हुए जागरण कर तीन बार आरती की जाती है और शिव पार्वती विवाह की कथा सुनी जाती है।

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