विकास के नए क्षितिज में हिंदी' विषय पर नगरपालिका पार्क में संगोष्ठी; प्रबुद्धजनों ने किया चिंतन, काव्य रचनाओं ने मोहा मन
जिला ब्यूरो चीफ बबलू जायसवाल
मनेंद्रगढ़
"150 करोड़ की आबादी वाला भारत यदि एकजुट होकर हिंदी को हृदय से अपनी संपर्क भाषा मान ले, तो इसे दुनिया की नंबर-एक भाषा बनने से कोई नहीं रोक सकता। जिस तरह चीन अपनी भाषाई विविधताओं के बावजूद 70 फीसदी मंदारिन के बल पर वैश्विक पटल पर मजबूती से खड़ा है, उसी तर्ज पर भारत को भी अपनी समृद्ध प्रांतीय भाषाओं का सम्मान करते हुए हिंदी को राष्ट्रभाषा का मुकाम दिलाना होगा।" यह सारगर्भित विचार अंचल के वरिष्ठ साहित्यकार बीरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव ने व्यक्त किए।
वे राष्ट्रीय हिंदी दिवस पखवाड़े के उपलक्ष्य में नगरपालिका पार्क में 'संबोधन साहित्य एवं कला विकास संस्थान' तथा 'वनमाली सृजन केंद्र, कोरिया' के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित विचार गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे।
राजभाषा से राष्ट्रभाषा तक का सफर तय करना जरूरी
संगोष्ठी में वक्ताओं ने भाषा के संवैधानिक और व्यावहारिक पक्षों पर खुलकर बात रखी:
संवैधानिक मर्यादा और जनसरोकार: श्रीमती ज्योति मजूमदार ने चिंता जताते हुए कहा कि हिंदी केवल कागजों में राजभाषा बनकर न रह जाए, इसे जन-जन की राष्ट्रभाषा बनाने का संकल्प हर नागरिक को लेना होगा।
सोचने और गढ़ने की भाषा: शिक्षाविद संजय सेंगर एवं जसपाल सिंह ने कहा कि माध्यम चाहे कोई भी हो, हिंदी अभिव्यक्ति और मौलिक सोच की सबसे सशक्त धुरी है। उन्होंने केंद्र सरकार की त्रि-भाषा नीति को हिंदी के विस्तार में मील का पत्थर बताया।
वैश्विक अनुवाद की शक्ति: वरिष्ठ साहित्यकार सतीश उपाध्याय ने कहा कि 'सद्भावना दर्पण' जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से वैश्विक साहित्य का हिंदी अनुवाद उपलब्ध कराना एक क्रांतिकारी कदम है, जिससे भाषा को अंतरराष्ट्रीय क्षितिज मिला है।
दफ्तरी अड़चनों पर चोट: वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम बिहारी रैकवार ने अदालतों में हिंदी के बढ़ते प्रभाव का स्वागत किया, लेकिन बैंकों और वित्तीय संस्थानों में आमजन से जुड़े फॉर्म अब भी अंग्रेजी में होने पर गहरी टीस जताई। उन्होंने कहा कि भाषा की यह दूरी आम आदमी को उसके अधिकारों से वंचित करती है।
अहिंदी भाषी राज्यों में बढ़ता रुझान: व्याख्याता टी. विजय गोपाल राव ने उदाहरण देते हुए कहा कि केरल जैसे राज्यों में त्रि-भाषा फॉर्मूले के चलते नई पीढ़ी शुद्ध हिंदी बोल रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ में भारतीय प्रतिनिधियों का हिंदी में बोलना इस बात का प्रमाण है कि भाषा का कद तेजी से बढ़ रहा है।
काव्य निशा: 'हिंदी टूटी-फूटी ही सही...' पर जमकर बजीं तालियां
विचार मंथन के उपरांत मुख्य अतिथि राशिद कुरैशी एवं संस्था अध्यक्ष अनिल कुमार जैन की अध्यक्षता में सरस कवि सम्मेलन सजा। साहित्यकार राजेश जैन के सधे संचालन में कवियों ने अपनी रचनाओं से देर रात तक श्रोताओं को बांधे रखा:
जसपाल सिंह कालरा की पंक्तियों— "हिंदी टूटी-फूटी ही सही, हर प्रांत में चल जाती है / जिस जुबान पर पड़े उसी जुबान में ढल जाती है" ने भाषा की सर्वसमावेशी शक्ति को रेखांकित किया।
गिरीश तिवारी ने आत्ममंथन का स्वर छेड़ते हुए पढ़ा— "हिंदी का अभिवादन करना चाहे तो हाथ हमारे बौने क्यों हो जाते हैं।"
पत्रकार रामचरित द्विवेदी ने जब बेटी की विदाई और ममत्व को पिरोते हुए पढ़ा— "तू अचार छोड़ने की बात मत कर लाडो, तू कहे तो मैं अचार की दुकान खोल दूं", तो सभागार भावुक हो उठा।
बीरेन्द्र श्रीवास्तव ने युवा पीढ़ी का आह्वान करते हुए प्रेरणादायी पंक्तियां सुनाईं— "हम जहां से चले तुम वहीं हो खड़े / थोड़ी कोशिश करोगे तो बढ़ जाओगे।"
साहित्य साधकों का जुटा जमघट
इस साहित्यिक संध्या में विजय गुप्ता, वीरांगना श्रीवास्तव, संगीता तिवारी, पुष्कर लाल तिवारी, निरंजन मित्तल सहित अंचल के अनेक प्रबुद्ध नागरिक, भाषा-प्रेमी एवं गणमान्य जन उपस्थित रहे। देर शाम तक चले इस गरिमामयी आयोजन ने नगर के सांस्कृतिक पटल पर एक अमिट छाप छोड़ी।


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