स्वास्थ्य क्रांति की राह पर छत्तीसगढ़: अस्पतालों में जन्म लेने वाले बच्चों की बढ़ी संख्या,मातृ-शिशु सुरक्षा में राष्ट्रीय औसत से आगे निकला राज्य

जिला ब्यूरो चीफ बबलू जायसवाल 



NFHS-6 रिपोर्ट ने दिखाई विकास की नई तस्वीर, लेकिन एनीमिया, कुपोषण और बढ़ती सिजेरियन डिलीवरी बनी चिंता

एमसीबी, मनेंद्रगढ़। छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी एक महत्वपूर्ण और उत्साहजनक तस्वीर सामने आई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) की ताजा रिपोर्ट ने संकेत दिए हैं कि राज्य स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने और मातृ-शिशु सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में लगातार प्रगति कर रहा है। अस्पतालों में प्रसव, टीकाकरण और गर्भवती महिलाओं की देखभाल जैसे कई महत्वपूर्ण मानकों पर राज्य ने उल्लेखनीय सुधार दर्ज करते हुए राष्ट्रीय औसत से बेहतर प्रदर्शन किया है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि बीते वर्षों में स्वास्थ्य अधोसंरचना के विस्तार, योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन और जागरूकता अभियानों का सकारात्मक प्रभाव अब आंकड़ों में दिखाई देने लगा है। विशेष रूप से संस्थागत प्रसव के क्षेत्र में राज्य ने उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। अब अधिकांश प्रसव स्वास्थ्य संस्थानों में हो रहे हैं, जिससे मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को नियंत्रित करने में मदद मिली है।

रिपोर्ट के अनुसार बच्चों के पूर्ण टीकाकरण में भी सुधार दर्ज किया गया है। साथ ही गर्भवती महिलाओं को प्रसव पूर्व जांच और स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ पहले की तुलना में अधिक मिल रहा है। कुपोषण की गंभीर श्रेणी मानी जाने वाली स्टंटिंग में भी कमी आई है, जो राज्य के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

हालांकि उपलब्धियों के बीच कुछ चुनौतियां अभी भी चिंता का विषय बनी हुई हैं। महिलाओं और बच्चों में एनीमिया की समस्या अपेक्षित स्तर पर नियंत्रित नहीं हो सकी है। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में खून की कमी अब भी स्वास्थ्य विभाग के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। इसके अलावा शहरी क्षेत्रों में मोटापा, उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के मामले भी बढ़ रहे हैं।

रिपोर्ट का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू सिजेरियन प्रसव को लेकर सामने आया है। निजी अस्पतालों में सामान्य प्रसव की तुलना में ऑपरेशन से प्रसव की बढ़ती संख्या स्वास्थ्य विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि चिकित्सा आवश्यकता के अनुरूप ही सिजेरियन डिलीवरी को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

दूरस्थ और आदिवासी बहुल क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाना अभी भी प्राथमिक आवश्यकता बनी हुई है। बस्तर सहित कई इलाकों में कुपोषण और एनीमिया के मामले राज्य के औसत से अधिक हैं। ऐसे क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं, पोषण कार्यक्रमों और जनजागरूकता अभियानों को और प्रभावी बनाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने रिपोर्ट को राज्य के लिए उत्साहवर्धक बताते हुए कहा कि संस्थागत प्रसव और मातृ-शिशु स्वास्थ्य में मिली सफलता स्वास्थ्य कर्मियों की मेहनत और सरकार की योजनाओं का परिणाम है। उन्होंने कहा कि दूरस्थ क्षेत्रों में एनीमिया और कुपोषण की समस्या को समाप्त करने के लिए विशेष रणनीति के तहत कार्य किया जाएगा तथा स्वास्थ्य सुविधाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के प्रयास और तेज किए जाएंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि छत्तीसगढ़ ने स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में मजबूत आधार तैयार कर लिया है। अब आवश्यकता इस बात की है कि विकास की यह गति दूरस्थ और आदिवासी अंचलों तक समान रूप से पहुंचे, ताकि स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ समाज के हर वर्ग को मिल सके। यदि वर्तमान प्रयासों को और मजबूती मिली तो आने वाले वर्षों में छत्तीसगढ़ देश के अग्रणी स्वास्थ्य राज्यों में अपनी पहचान और मजबूत कर सकता है।

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