‘रक्तदान’ बना साक्षात वरदान: जब जिंदगी की डोर टूटने को थी, तब काम आया स्वास्थ्य मंत्री का दिया खून


 5 ग्राम हीमोग्लोबिन के साथ मौत से जूझ रही थी 26 वर्षीय महिला, नहीं मिला डोनर तो ब्लड बैंक में सुरक्षित मंत्री का रक्त बना संजीवनी

• 17 सितंबर का संकल्प बना 26 साल की लाचार बहन के लिए जीवन रक्षा का मजबूत कवच

जिला ब्यूरो चीफ बबलू जायसवाल 

मनेंद्रगढ़

जब शरीर में खून की आखिरी बूंदें जवाब देने लगें और सांसों की डोर टूटती नजर आए, उस वक्त एक यूनिट रक्त ईश्वर के वरदान से कम नहीं होता। कोरिया-एमसीबी अंचल में मानवता और संवेदनशील नेतृत्व की एक ऐसी ही मिसाल सामने आई है, जहां छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल द्वारा कुछ दिन पूर्व किया गया रक्तदान एक अनजान, बेबस महिला के लिए नई जिंदगी का जरिया बन गया।

गंभीर एनीमिया के चलते मौत के मुहाने पर खड़ी 26 वर्षीय एक महिला को जब आपात स्थिति में 'बी-पॉजिटिव' रक्तदाता नहीं मिला, तो अस्पताल के ब्लड बैंक में महफूज रखा स्वास्थ्य मंत्री का रक्त सीधे उसके जिस्म में उतरा और उसकी बुझती उम्मीदों को फिर से रोशन कर दिया।

क्रिटिकल मोड पर थी धड़कनें, 5 ग्राम पर आ थमा था हीमोग्लोबिन

चिकित्सीय दस्तावेजों के मुताबिक, मरीज महिला की हालत बेहद नाजुक हो चुकी थी। शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा लुढ़ककर मात्र 5 ग्राम प्रति डेसीलीटर पर आ टिकी थी। मेडिकल साइंस के अनुसार इस स्तर पर दिल का दौरा पड़ने या मल्टी-ऑर्गन फेलियर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। डॉक्टरों ने बिना एक पल गंवाए तत्काल दो यूनिट 'B+' रक्त चढ़ाने की ताकीद की।

परिवार पर उस वक्त विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा जब सगे-संबंधियों और परिचितों में कोई भी उपयुक्त डोनर मौके पर नहीं मिल सका। हर बीतता मिनट महिला की जिंदगी पर भारी पड़ रहा था। ऐसे संकट के क्षणों में स्वास्थ्य विभाग की निगरानी में सुरक्षित रखा गया स्वास्थ्य मंत्री का रक्त उस महिला के लिए रक्षक बनकर सामने आया और तुरंत ट्रांसफ्यूजन शुरू कर स्थिति को संभाला गया।

औपचारिकता नहीं, आत्मा से जुड़ी सेवा: 17 सितंबर का दान आज बना प्राणरक्षक

विदित हो कि बीते 17 सितंबर को 'सेवा संकल्प अभियान' (द्वितीय चरण) के आगाज पर स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने आमजन को प्रेरित करने खुद अपनी बांहें आगे कर रक्तदान किया था। अमूमन वीआईपी दौरों में ऐसे कदमों को फोटो-सेशन या रस्मी औपचारिकता मान लिया जाता है, लेकिन किसे पता था कि मंत्री जी के शरीर से निकला वही रक्त चंद रोज बाद जिले की ही एक जरूरतमंद बेटी के जिस्म में नया खून बनकर दौड़ेगा।

इस वाकये ने यह सिद्ध कर दिया है कि अस्पताल के ब्लड बैंक में रखी रक्त की हर बूंद किसी न किसी की सांसों की अमानत होती है, जो जाति, वर्ग और ओहदे के भेदभाव से परे सिर्फ इंसानियत का फर्ज निभाती है।

मातृत्व सुरक्षा और जन-विश्वास की अनूठी मिसाल

ग्रामीण और कोयलांचल क्षेत्र में महिलाओं में कुपोषण और एनीमिया एक खामोश महामारी की तरह है। प्रसव या अन्य जटिलताओं के दौरान रक्त की कमी कई बार असमय मौत की वजह बन जाती है। ऐसे में समय पर रक्त की उपलब्धता ने न केवल एक महिला की जान बचाई, बल्कि एक पूरे परिवार को उजड़ने से बचा लिया।

मरीज के परिजनों का कहना है कि वे इस बात से पूरी तरह अनजान थे कि जिस रक्त से उनकी बेटी की सांसें लौट रही हैं, वह प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री का है। जब यह हकीकत सामने आई, तो परिजनों की आंखें कृतज्ञता से छलक उठीं।

> "रक्तदान की सबसे पावन बात यही है कि रक्त देने वाले को यह इल्म नहीं होता कि उसका खून किस जिस्म को नई ऊर्जा देगा। स्वास्थ्य मंत्री जी का यह कदम भाषणों से परे उस जमीनी सेवा का प्रमाण है, जिसने एक मां-बेटी की सांसों को महफूज रख लिया।"

>

Post a Comment

Previous Post Next Post